IAS और IPS में भी पहले सामने आ चुके हैं ऐसे मामले: उत्तराखंड में समयपूर्व सेवानिवृत्ति की चर्चा केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रही है. आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के भी ऐसे मामले सामने आए हैं. इनमें कुछ नाम इस तरह से हैं…
- पूर्व IAS अधिकारी उमाकांत पंवार का नाम इस सूची में शामिल रहा है. उन्होंने नियमित सेवानिवृत्ति से कई साल पहले सेवा छोड़ दी थी. उनकी पत्नी और पूर्व IAS अधिकारी मनीषा पंवार ने भी बाद में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी.
- पूर्व IAS अधिकारी राकेश कुमार ने भी निर्धारित समय से पहले सेवा छोड़ी थी. बाद में वे उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष बने. IAS अधिकारी भूपेंद्र कौर औलख और IPS अधिकारी वी. विनय कुमार के नाम भी समयपूर्व सेवानिवृत्ति के मामलों में सामने आए हैं.
- IAS अधिकारी बीवीआरसी पुरुषोत्तम का मामला भी चर्चा में रहा. उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए वीआरएस के लिए आवेदन किया था, उस समय उनके सेवाकाल में एक दशक से अधिक समय बाकी बताया गया था. उन्होंने अपने गृह राज्य में प्रतिनियुक्ति का विकल्प भी तलाशा था, लेकिन अंतरराज्यीय प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया में बाधाएं सामने आई थीं.
- स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के लिए आवेदन करने वालो की फेहरिस्त में आईपीएस (IPS) असीम श्रीवास्तव और रचिता जुयाल का नाम भी शामिल है. जिन्होंने निजी क्षेत्र में ज्यादा बेहतर मौके होने की स्थिति को देखते हुए अखिल भारतीय सेवा से बाहर निकलने का फैसला लिया.
- 2014 बैच के IPS लोकेश्वर सिंह भी वीआरएस लेने वालों की सूची में हैं. उन्होंने हरिद्वार, देहरादून, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ में सेवाएं दीं हैं. पौड़ी के एसएसपी रहते हुए अक्टूबर 2025 में उन्होंने इस्तीफा दिया था. संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय संगठन में चयन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया. हालांकि, उनके साथ कुछ विवाद भी जुड़े रहे और एक व्यक्ति की पिटाई के मामले में वह सुर्खियों में रहे जिसमें पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने उन्हें दोषी भी पाया.
उत्तर प्रदेश में बतौर IAS कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एसएस पांगती बताते हैं कि,
इन मामलों में सभी अधिकारियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं. कहीं पारिवारिक कारण सामने आए. कहीं स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां और कहीं दूसरे प्रशासनिक विकल्पों की बात कही गई.
क्या प्रतिष्ठित सेवा में बने रहना अब भी पहली पसंद है? अखिल भारतीय सेवाओं में चयन को लंबे समय तक सुरक्षित करियर, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यापक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन समय से पहले सेवानिवृत्ति के मामले यह समझने का अवसर देते हैं कि अधिकारी अपने करियर और निजी जीवन के बीच संतुलन कैसे तय कर रहे हैं?
निजी क्षेत्र में बढ़ते अवसर, पारिवारिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य, गृह राज्य में रहने की इच्छा और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं ऐसे फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं. दूसरी ओर प्रशासनिक जिम्मेदारियों, विभागीय प्रक्रियाओं और कामकाज के माहौल से जुड़े विषय भी ऐसे फैसलों का कारण बन सकते हैं.
सवाल केवल VRS का नहीं, प्रशासनिक व्यवस्था को समझने का भी: साकेत बडोला के फैसले के बाद उत्तराखंड में वरिष्ठ अधिकारियों के वीआरएस का विषय फिर चर्चा में है. मनोज चंद्रन, धनंजय मोहन और उनसे पहले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के मामलों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि समयपूर्व सेवानिवृत्ति राज्य के प्रशासनिक इतिहास में नया विषय नहीं है, लेकिन समय के साथ बढ़ रहे यह मामले चिंता जरूर पैदा करते हैं.
वहीं, इस मामले में रिटायर्ड आईएफएस अफसर जयराज अपनी बात दो टूक रखते हुए कहते हैं कि,
फिलहाल, ये मामले बताने के लिए काफी हैं कि अफसरों का अखिल भारतीय सेवा से मोहभंग हो रहा है. वो वित्तीय रूप से ज्यादा बेहतर स्थिति मिलने पर इस प्रतिष्ठित सेवा को त्यागने के लिए भी तैयार रहते हैं. देश की प्रतिष्ठित सेवाओं में चयन जितनी बड़ी उपलब्धि है, उतना ही महत्वपूर्ण यह समझना भी है कि अधिकारी अपना सेवाकाल पूरा होने से पहले बाहर निकलने का निर्णय क्यों लेते हैं.
उत्तराखंड में अब इस सवाल का जवाब केवल चर्चाओं से नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों और तथ्यों से तलाशने की जरूरत है. राज्य के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है. क्योंकि, प्रदेश में भारतीय वन सेवा से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा तक में अधिकारियों की कमी है और इस तरह अधिकारियों के सेवा से बाहर जाने की स्थिति में यह कमी और भी बढ़ रही है. खास बात ये भी है कि ज्यादातर अधिकारी वीआरएस के लिए आवेदन करने के दौरान केवल पारिवारिक कारण बताकर अपने इस कदम के पीछे की असल वजह नहीं बताते.
इसके पीछे भी एक वजह यह मानी जाती है कि अधिकारी दूसरे अच्छे विकल्प के कारण अखिल भारतीय सेवा छोड़ने की जानकारी देने पर वीआरएस स्वीकृत नहीं होने का अंदेशा लगा लेते हैं. जबकि, नियमों में स्पष्ट है कि 3 महीने के भीतर ऐसे अधिकारी का वीआरएस स्वीकृत करना अनिवार्य होता है. जब तक कि सरकार के पास ऐसा न करने का कोई ठोस कारण ना हो.