आलाकमान से नाराज या सत्ता के लिए लड़ाई, जानें संगठन से उलट ‘हरदा’ की यात्रा के असली मायने – Uttarakhand Surya

आलाकमान से नाराज या सत्ता के लिए लड़ाई, जानें संगठन से उलट ‘हरदा’ की यात्रा के असली मायने

हरीश रावत और कांग्रेस आलाकमान के रिश्तों में उतार चढ़ाव कोई नया नहीं है. 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में थे. लेकिन पार्टी नेतृत्व ने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया. उस समय रावत समर्थक विधायकों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी. उनके आवास पर समर्थकों ने नारेबाजी की और बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले पर असंतोष जताया था. बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 2014 में हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया.

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी टिकट और नेतृत्व को लेकर हरीश रावत की सक्रियता लगातार चर्चा में रही. उस समय कांग्रेस ने उन्हें चुनाव अभियान समिति की कमान दी थी. लेकिन मुख्यमंत्री चेहरे और टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद बने रहे. अब 2027 के चुनाव से पहले स्थिति कुछ अलग है. इस बार हरीश रावत के पास पहले जैसी औपचारिक संगठनात्मक भूमिका नहीं है. लेकिन वह लगातार प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय हैं. अप्रैल 2026 में उनके पार्टी गतिविधियों से 15 दिन के ब्रेक को भी उस समय राजनीतिक संदेश के रूप में देखा गया था. पार्टी नेतृत्व से उपेक्षित महसूस करने की बात सामने आई थी.
-सुनील दत्त, राजनीतिक जानकार-

क्या लड़ाई अगली पीढ़ी के लिए: हरीश रावत की मौजूदा सक्रियता के बीच उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका सबसे अहम सवालों में से एक है. उनकी बेटी अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण सीट से विधायक हैं. 2022 में उन्होंने इस सीट से जीत हासिल की थी. जहां कांग्रेस लंबे समय से चुनाव नहीं जीत सकी थी. अब हरीश रावत अपने बेटे आनंद रावत की चुनावी दावेदारी को लेकर भी खुलकर इच्छा जाहिर कर चुके हैं. उन्होंने खुद कहा है, उनकी दिली इच्छा है कि आनंद रावत इस बार चुनावी मैदान में उतरें और उनकी उत्तराखंडियत की सोच और उत्तराखंड से उनका रिश्ता आगे बढ़ाएं. यही नहीं, आनंद रावत को लेकर हरीश रावत ने अब अपना रुख भी काफी साफ कर दिया है. उनका कहना है कि,

अगर कांग्रेस को लगता है कि आनंद ऐसी किसी सीट पर पार्टी को मजबूती से चुनाव लड़ा सकते हैं, जहां कांग्रेस लंबे समय से नहीं जीती है तो उन्हें टिकट दिया जाना चाहिए. रावत ने डीडीहाट जैसी सीट का उदाहरण देते हुए मजबूत उम्मीदवार की जरूरत की बात कही है. अगर पार्टी को आनंद से बेहतर उम्मीदवार मिलता है और उसके जीतने की संभावना अधिक मानी जाती है तो पार्टी उसे टिकट दे.
-हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री-

‘एक परिवार एक टिकट’ फॉर्मूला, सबसे बड़ा सवाल: यहीं से कांग्रेस के पुराने ‘एक परिवार एक टिकट’ फॉर्मूले की चर्चा दोबारा शुरू हो जाती है. 2022 में भी हरीश रावत परिवार इसी सवाल के केंद्र में था. उस समय हरिद्वार ग्रामीण सीट पर अनुपमा रावत की दावेदारी और हरीश रावत के खुद चुनाव लड़ने की संभावना के बीच कांग्रेस के सामने परिवार को लेकर यही दुविधा थी. आखिरकार अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव जीतीं और अब वह विधायक हैं. अब सवाल यह है कि अगर अनुपमा फिर से प्रत्याशी बनती हैं और आनंद भी विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं तो कांग्रेस नेतृत्व परिवार के भीतर टिकट के सवाल को किस तरह देखता है? हरीश रावत ने भले ही फैसला पार्टी के हाथ में छोड़ने की बात कही हो लेकिन उनकी सार्वजनिक इच्छा ने इस मुद्दे को चुनावी चर्चा के केंद्र में ला दिया है. ऐसे में उनकी मौजूदा यात्राओं को सिर्फ धन्यवाद यात्रा के तौर पर देखने के बजाय परिवार की अगली राजनीतिक पारी से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

हरिद्वार से लेकर खानपुर तक सक्रियता: इसी बीच खुद हरीश रावत की चुनावी भूमिका को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है. हाल ही में उन्होंने हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा का संकेत दिया था. इसके बाद खानपुर सीट को लेकर उनके दूसरे बेटे वीरेंद्र की सक्रियता और संभावित चुनाव लड़ने की चर्चा कई बार सामने आ चुकी है. ऐसे में सवाल है कि क्या हरीश रावत यात्रा के जरिए कांग्रेस में अपनी भूमिका को फिर से प्रभावी तरीके से स्थापित करना चाहते हैं.

भाजपा ले रही है चुटकी: भाजपा भी इस मामले में चुटकी लेने से पीछे नहीं हट रही है. प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि,

हरीश रावत की यात्रा से उनके अपने परेशान हैं. भाजपा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. हरीश रावत चाहते हैं कि आगामी चुनाव में उनके परिवार का ख्याल रखा जाए. लेकिन कांग्रेस उन्हें ये सब करने से रोक रही है. अब ये जनता को तय करना है कि चुनाव से पहले ही कांग्रेस में सिर फुटव्वल होने लगा है तो बाद में क्या हालात होंगे?
-महेंद्र भट्ट, भाजपा अध्यक्ष, उत्तराखंड-

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती: पार्टी नेतृत्व चाहता है कि चुनाव से पहले सभी नेता एक साझा रणनीति और संगठनात्मक ढांचे के तहत काम करें. दूसरी तरफ हरीश रावत अपनी यात्रा को व्यक्तिगत जनसंवाद बता रहे हैं. इसमें कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं की मौजूदगी भी दिखाई दे रही है. कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा की आपत्ति और इसके बाद भी यात्रा जारी रखने से यह साफ है कि दोनों पक्षों के कार्यक्रम और राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच अंतर मौजूद है. अब असली परीक्षा 7 अक्टूबर को दिल्ली मुलाकात के बाद होगी.

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