ऐसा नहीं है कि प्रदेश में 26 साल के दौरान विकास ना हुआ हो. लेकिन जिस सुनियोजित तरीके से इस पर काम किया जाना चाहिए था, उस तरह के प्रयास नहीं किए गए हैं. भौगोलिक रूप से राज्य के जनपदों में भारी अंतर है. इसलिए यह आर्थिक अंतर भी दिखाई देता है.
-प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी, आर्थिक जानकार-
गांधी कहते हैं कि चिंता की बात यह नहीं है कि मैदानी जिलों से पर्वतीय जिलों का आर्थिक स्वरूप कमजोर है, बल्कि यह है कि पर्वतीय जनपदों में आर्थिक रफ्तार की गति, मौजूदा स्थिति से काफी ज्यादा तेज की जा सकती थी.
उधर नौ पर्वतीय जिलों में औद्योगिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन करीब 10,782 करोड़ रुपये था, जो कुल सकल मूल्य संवर्धन का महज 8.6 फीसदी है. हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे जिलों में औद्योगिक इकाइयों, विनिर्माण, बड़े कारोबार और उनसे जुड़ी सेवाओं का विस्तार इस अंतर की प्रमुख वजहों में शामिल है. पर्वतीय जिलों में औद्योगिक गतिविधियां सीमित हैं. वहां परिवहन लागत, बाजार तक पहुंच, जमीन की उपलब्धता, कच्चे माल और कुशल श्रम से जुड़ी चुनौतियां उद्योगों के विस्तार को प्रभावित करती हैं. औद्योगिक गतिविधियों में जो आंकड़े दिए गए हैं, उनमें खनन गतिविधियां भी शामिल हैं.
खेती और प्राकृतिक संसाधनों में पहाड़ों की मौजूदगी: प्राथमिक क्षेत्र में तस्वीर औद्योगिक क्षेत्र से कुछ अलग है. इसमें कृषि, बागवानी, पशुपालन, वानिकी, मत्स्य पालन और खनन जैसी गतिविधियां शामिल हैं. साल 2021-22 में नौ पर्वतीय जिलों का प्राथमिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 11,765 करोड़ रुपये रहा, जबकि हरिद्वार और उधम सिंह नगर का आंकड़ा 10,746 करोड़ रुपये था. देहरादून और नैनीताल को जोड़ने पर यह 6,577 करोड़ रुपये रहा.
इससे साफ है कि पर्वतीय जिलों में प्राथमिक क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं. लेकिन इन गतिविधियों को बड़े बाजार, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और वैल्यू एडिशन से जोड़ने की चुनौती बनी हुई है. पहाड़ों में पैदा होने वाले कृषि और बागवानी उत्पादों का स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और मार्केटिंग सीमित रहने से उत्पाद का बड़ा आर्थिक लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था में नहीं जुड़ पाता. यानी प्राकृतिक संसाधनों और उत्पादन की मौजूदगी के बावजूद उससे बड़े स्तर पर आर्थिक मूल्य तैयार करने की क्षमता अभी सीमित है.
सेवाओं में भी शहरी जिलों का दबदबा: सेवा क्षेत्र में भी देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर और नैनीताल आगे हैं. साल 2021-22 में देहरादून का सेवा क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 26,328 करोड़ रुपये, उधम सिंह नगर का 19,136 करोड़, हरिद्वार का 17,802 करोड़ और नैनीताल का 12,848 करोड़ रुपये था. इन चार जिलों की भूमिका 76,114 करोड़ रुपये रही, जो सभी जिलों के सेवा क्षेत्र के कुल 1,05,233 करोड़ रुपये का करीब 72.3 फीसदी है.
सेवा क्षेत्र में व्यापार, परिवहन, होटल और रेस्तरां, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, सार्वजनिक प्रशासन और अन्य सेवाएं शामिल हैं. देहरादून में सरकारी और प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रियल एस्टेट का बड़ा आधार है. वहीं हरिद्वार और उधम सिंह नगर में औद्योगिक गतिविधियों के साथ उनसे जुड़ी सेवाओं का विस्तार हुआ है. पर्वतीय जिलों में पर्यटन और धार्मिक गतिविधियां आर्थिक अवसर तो पैदा करती हैं, लेकिन उनका लाभ सभी क्षेत्रों और स्थानीय कारोबार तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है.
प्रति व्यक्ति आय में भी बड़ा अंतर: जिला घरेलू उत्पाद के साथ प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी आर्थिक असमानता को सामने रखते हैं. साल 2021-22 में हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय 3,62,688 रुपये आंकी गई. उधमसिंह नगर में यह 2,69,070 रुपये और देहरादून में 2,35,707 रुपये थी. इसके मुकाबले पर्वतीय जिलों में चमोली की प्रति व्यक्ति आय 1,27,330 रुपये के साथ सबसे अधिक रही. पिथौरागढ़ में यह 1,18,678 रुपये, चंपावत में 1,16,136 रुपये, पौड़ी में 1,08,640 रुपये और उत्तरकाशी में 1,07,281 रुपये थी.
टिहरी में प्रति व्यक्ति आय 1,03,345 रुपये, अल्मोड़ा में 1,00,844 रुपये और बागेश्वर में 98,755 रुपये रही. सबसे कम प्रति व्यक्ति आय रुद्रप्रयाग में 93,160 रुपये दर्ज की गई. इस तरह हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय रुद्रप्रयाग से करीब 3.9 गुना ज्यादा थी.
पहाड़ों में विकास की रफ्तार के आंकड़े भी एक जैसे नहीं: साल 2021-22 में स्थिर कीमतों पर आर्थिक वृद्धि दर के मामले में पर्वतीय जिलों ने कुछ बेहतर प्रदर्शन भी किया. चमोली की वृद्धि दर 11.5 फीसदी, पिथौरागढ़ और चंपावत की 11.2 फीसदी रही. वहीं हरिद्वार की वृद्धि दर 10.3 फीसदी, रुद्रप्रयाग और टिहरी की 9.58 फीसदी तथा देहरादून की 8.78 फीसदी थी. लेकिन बागेश्वर की वृद्धि दर 7.92 फीसदी और उधम सिंह नगर की 7.65 फीसदी रही.
निदेशालय ने चमोली में सेवा क्षेत्र की वृद्धि और पिथौरागढ़ तथा चंपावत में व्यापार, मरम्मत, होटल और रेस्तरां क्षेत्र में बढ़ोतरी को इन जिलों की बेहतर वृद्धि दर की वजह बताया है.
आंकड़े ही बयां कर रहे असंतुलन: रिपोर्ट के आंकड़े यह सवाल खड़ा करते हैं, कि राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी पर्वतीय जिलों में रोजगार, उद्योग और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का अपेक्षित विस्तार क्यों नहीं हो पाया. पर्यटन, बागवानी, वन आधारित उत्पाद, जड़ी-बूटी, पशुपालन और जल संसाधनों में संभावनाओं के बावजूद इन क्षेत्रों को मजबूत स्थानीय अर्थव्यवस्था में बदलने की चुनौती बनी हुई हैं. पहाड़ों में उत्पादन होता है, लेकिन प्रोसेसिंग, मार्केटिंग और बड़े कारोबार का केंद्र अक्सर मैदानी जिले बन जाते हैं. इससे रोजगार और आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा भी उन्हीं क्षेत्रों में केंद्रित रहता है.
इन हालात को लेकर प्रदेश में सबसे ज्यादा चिंतित वह लोग दिखाई देते हैं, जिन्होंने राज्य आंदोलन में हिस्सेदारी की थी. राज्य आंदोलनकारी प्रदीप कुकरेती कहते हैं कि-
राज्य की संकल्पना पर्वतीय जनपदों से जुड़ी रही है, लेकिन इसका फायदा मैदानी क्षेत्र में ही दिखाई देता रहा है. राज्य सरकारों ने भी प्रदेश के पर्वतीय जनपदों के स्वरूप को बदलने के लिए बातें तो की, लेकिन धरातल पर कोई ठोस नीति लागू नहीं की जा सकी. नतीजा यह है कि 26 साल बाद आज भी पहाड़ों से पलायन और वहां मूलभूत सुविधाएं विकसित करने तक ही अभी बात हो रही है.
-प्रदीप कुकरेती, राज्य आंदोलनकारी-